दिल्ली : विभिन्न राज्यों से लौट कर आए युवा अपने गांव में बेरोजगारी के चलते बहुत परेशान हैं। सरकार भी बड़े-बड़े घोषणा कर रहे हैं कि हमारे पहाड़ों पर लोगों को रोजगार दिए जाएंगे ।परंतु जब युवा रोजगार की तलाश में भटक रहा है तो कोई उन्हें रोजगार के लिए रास्ता नहीं दिखा रहा है । बेरोजगारी के चलते युवाओं की मानसिक स्थिति भी बदहाल होती जा रही है सरकार कहती है कि स्वरोजगार योजना के तहत उनको ऋण दिया जाएगा। परंतु उस उसमें इतनी सारी शर्ते हैं।
जिसे पूरा कर पाना उनके बस की बात नहीं है ।अगर सरकार उनको रोजगार देना ही चाहती है तो उसके लिए ऋण देने के आसान तरीके उनको बताएं और गांव में जा जाकर सभी युवाओं को स्वरोजगार के बारे में बताएं। क्योंकि कहने और करने में बहुत अंतर है ।सरकारों की योजनाएं एयर कंडीशन कमरों में बैठकर बनती है और जब उन्हें धरातल पर उतारते हैं तब पता चलता है कहां कमियां रह गई है ।इसलिए सरकार को अगर योजना बनाने है तो युवाओं के बीच बैठकर उनसे पूछ कर बनानी चाहिए कि वो क्या रोजगार करना चाहते हैं। अतः उनको आसान तरीके से ऋण उपलब्ध कराना चाहिए।
परंतु सरकार चाहती है कि वह मनरेगा में ही दीहाडी मजदूरी करें। और उसे ही वह रोजगार मानती है। पढ़ा लिखा हुआ कभी भी दीहाडी मजदूरी नहीं करेगा। और वह लॉकडाउन के बाद फिर दूसरे राज्य में नौकरी की भीख मांगने लग जाएगा।अगर सरकार चाहती है कि वह दूसरों राज्यों में नौकरी के लिए भीख मांगने में जाए तो वह इस वक्त बहुत कुछ युवाओं के लिए कर सकती है। जैसे कि पशुपालन क्षेत्र में डेयरी फार्म के लिए बहुत सारे युवा काम करना चाहते हैं। अपने होटल बनाने के लिए काम करना चाहते हैं और भी बहुत सारे युवाओं से जब मेरी बात हुई तो उन्होंने अपने बहुत सारे प्लान मेरे सामने रखें परंतु मैंने जब उनसे पूछा कि मुसीबत कहां है तो उन्होंने अपनी बात रखी कि हमें बैंक से ऋण उपलब्ध नहीं हो पा रहा है जब भी हम बैंक में जाते हैं तो बैंक वाले बहुत सारे खानापूर्ति बता देते हैं जो हमारे बस की बात नहीं है इसलिए हम बहुत परेशान हैं। इसलिए मैं सरकार से निवेदन करता हूं कि यदि युवाओं को रोजगार देना है तो उनकी मदद करें उनकी बातों को समझे और उन्हें स्वरोजगार के अवसर दें। ताकि हमारे पहाड़ों का पलायन रुक सके। क्योंकि इस वक्त बहुत सारे युवा अपने गांव में है और वह बाहर जाना भी नहीं चाहते हैं।
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